Wednesday, 26 February 2020, 10:32 AM

जीवन मंत्र

दु:खी होने की बजाय दुख का उपचार करें 

Updated on 24 February, 2020, 6:00
लोगों से अपने सुना होगा कि संसार में दु:ख ही दु:ख है। असफलता मिलने पर कई बार आप भी यही सोचते होंगे, जबकि वास्तविकता इससे भिन्न है। संसार में दु:ख इसलिए है क्योंकि संसार में सुख है। अगर सुख नहीं होता तो दु:ख का अस्तित्व भी नहीं होता है। ईश्वर... आगे पढ़े

 कहीं आप भी पाप की पूंजी तो जमा नहीं कर रहे 

Updated on 23 February, 2020, 6:00
क्या आपने कभी किसी के ऊपर हो रहे अत्याचार के विरूद्ध आवाज उठायी है। किसी कमज़ोर और लाचार को पिटता देखकर मदद के लिए आगे आएं हैं। अगर आपने ऐसा नहीं किया है तो समझ लीजिए आपने अपने खाते में पाप की पूंजी जमा कर ली है। शाŒााW में जिस... आगे पढ़े

शरीर तो मंदिर है

Updated on 22 February, 2020, 6:00
आस्तिकता और कर्त्तव्यपरायणता की सद्वृत्ति का प्रभाव सबसे पहले सबसे समीपवर्ती स्वजन पर पड़ना चाहिए। हमारा सबसे निकटवर्ती सम्बन्धी हमारा शरीर हैं। उसके साथ सद्व्यवहार करना, उसे स्वस्थ और सुरक्षित रखना अत्यावश्यक है। शरीर को नर कहकर उसकी उपेक्षा करना अथवा उसे सजाने-संवारने में सारी शक्ति खर्च कर देना, दोनों... आगे पढ़े

 इसलिए सबसे छोटा है कलियुग 

Updated on 20 February, 2020, 6:00
शास्त्रों में सृष्टि के आरंभ से प्रलय काल तक की अवधि को चार युगों में बांटा गया है। वर्तमान में हम जिस युग में जी रहे हैं उसे कलयुग कहा गया है। इससे पहले तीन युग बीत चुके हैं सतयुग, त्रेता और द्वापर। भगवान श्री राम का जन्म त्रेतायुग में... आगे पढ़े

 ईश्वर हमेशा भक्तों की सहायता करता है

Updated on 19 February, 2020, 6:00
ईश्वर को हम भले ही न देख पाएं लेकिन ईश्वर हर क्षण हमें देख रहा होता है। उसकी दृष्टि हमेशा अपने भक्तों एवं सद्व्यक्तियों पर रहती है। अगर आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि जीवन में कभी न कभी कठिन समय में ईश्वर स्वयं आकर आपकी सहायता कर चुके हैं।... आगे पढ़े

प्रभु भक्ति में बीते समय 

Updated on 18 February, 2020, 6:00
यह भौतिक जगत प्रकृति के गुणों के चमत्कार के अन्तर्गत कार्य कर रहा है। मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी चेतना कृष्ण कार्य में लगाए। कृष्णकार्य भक्तियोग के नाम से विख्यात हैं। इसमें न केवल कृष्ण अपितु उनके विभिन्न पूर्णाश भी सम्मिलित हैं- यथा राम तथा नारायण। कृष्ण के असंख्य... आगे पढ़े

 उत्तम शरण है धर्म  

Updated on 17 February, 2020, 6:00
धर्म के बारे में भिन्न-भिन्न अवधारणाएं हैं। कुछ जीवन के लिए धर्म की अनिवार्यता को स्वीकार करते हैं। कुछ लोगों का अभिमत है कि धर्म ढकोसला है। वह आदमी को पंगु बनाता है और रूढ़ धारणाओं के घेरे में बंदी बना लेता है। शायद इन्हीं अवधारणाओं के आधार पर किसी... आगे पढ़े

खुद को दूसरों से श्रेष्ठ मानकर अहंकार न करें

Updated on 16 February, 2020, 6:00
ईश्वर ने जब संसार की रचना की तब उसने सभी जीवों में एक समान रक्त का संचार किया। इसलिए मनुष्य हो अथवा पशु सभी के शरीर में बह रहा खून का रंग लाल है। विभिन्न योनियों की रचना भी इसलिए की ताकि मनुष्य कभी इस बात का अहंकार न करें... आगे पढ़े

 भगवान की नज़र में हर इनसान बराबर है

Updated on 14 February, 2020, 6:00
इतिहास के पन्नों को उलट करके देखेंगे तो पाएंगे कि आज जितना ऊंच-नीच एवं अमीर-गरीब का भेद-भाव है वह वैदिक काल के आरंभ में नहीं था। उस समय सामाजिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए कर्म के अनुसार वर्ग विभेद किया गया। लेकिन बाद में व्यवस्थाओं में जटिलता... आगे पढ़े

दुखी चित्त के लक्षण हैं उत्सव

Updated on 12 February, 2020, 9:45
दुनिया में दो ही तरह के लोग हैं- एक वे जो अपने को नया करने का राज खोज लेते हैं, और एक वे जो अपने को पुराना बनाए रखते हैं और चीजों को नया करने में लगे रहते हैं। भौतिकवादी और आध्यात्मवादी में एक ही फर्क है। आध्यात्मवादी रोज अपने... आगे पढ़े

युवकत्व की पहचान

Updated on 11 February, 2020, 6:00
मनुष्य स्वतंत्र संकल्प का स्वामी होता है। उसका संकल्प जैसा होता है, व्यक्तित्व भी वैसा ही ना\मत हो जाता है। सृजन और ध्वंस के संस्कार मनुष्य के भीतर होते हैं। उन संस्कारों को वह संकल्पशक्ति के सहारे बदल सकता है। जिस व्यक्ति में विधायक भावों की प्रचुरता होता है वह... आगे पढ़े

समय का चक्र

Updated on 10 February, 2020, 6:00
जब तुम्हें लगता है कि समय बहुत कम है, तुम या तो बेचैन होते हो या अत्यन्त सजगता की अवस्था में होते हो। दुखी या उत्सुक होने पर तुम्हें समय बहुत लम्बा लगता है। जब तुम प्रसन्न हो और जो कुछ कर रहे हो, उसमें आनंद आ रहा है, तब... आगे पढ़े

राष्ट्रीय एकता में बाधक तत्व 

Updated on 8 February, 2020, 6:15
आर्थिक और सामाजिक असमानता राष्ट्रीय एकता में बहुत बड़ी बाधा है। उस असमानता का मूल है अहं और स्वार्थ। इसलिए राष्ट्र की भावात्मक एकता के लिए अहं-विसर्जन और स्वार्थ-विसर्जन को मैं बहुत महत्व देता हूं। जातीय असमानता भी राष्ट्रीय एकता का बहुत बड़ा विघ्न है। उसका भी मूल कारण अहं... आगे पढ़े

सुख, शांति चाहिये तो प्रकृति को समझें  

Updated on 7 February, 2020, 6:30
प्रकृति और मनुष्य के बीच बहुत गहरा संबंध है। मनुष्य के लिए धरती उसके घर का आंगन, आसमान छत, सूर्य-चांद-तारे दीपक, सागर-नदी पानी के मटके और पेड़-पौधे आहार के साधन हैं। इतना ही नहीं, मनुष्य के लिए प्रकृति से अच्छा गुरु नहीं है। कवियों ने प्रकृति के सान्निध्य में रहकर... आगे पढ़े

 मन की शक्ति

Updated on 7 February, 2020, 6:00
मन को जीवन का केंद्रबिंदु कहना असंभव नहीं है। मनुष्य की प्रियाओं, आचरणों का प्रारंभ मन से ही होता है। मन तरह-तरह के संकल्प, कल्पनाएं करता है। जिस ओर उसका रुझान हो जाता है उसी ओर मनुष्य की सारी गतिविधियां चल पड़ती है। जैसी कल्पना हो उसी के अनुरूप प्रयास-पुरुषार्थ... आगे पढ़े

विचार-निर्विचार, चिंतन-अचिंतन

Updated on 6 February, 2020, 6:00
पूरा विश्व, विचारों पर चलता है, सारे आविष्कार, युध्द, आतंकवाद, साहित्य सृजन, भाषण, प्रवचन, तू-तू, मैं-मैं सब विचारों की देन है। विचार ही सब कार्यों को अंजाम देता है। भक्ति, प्रार्थना, व्यवहार, सेवा सब विचारों की देन है। हम सोचते हैं तो करते हैं होता है। अब प्रश्न यह है... आगे पढ़े

प्रधानता आत्मा को

Updated on 5 February, 2020, 6:00
मनुष्य सामान्यत: जो बाह्य में देखता, सुनता, समझता है वह यथार्थ ज्ञान नहीं होता। किन्तु भ्रमवश उसी को यथार्थ ज्ञान मान लेता है।   अवास्तविक ज्ञान को ही ज्ञान समझकर और उसके अनुसार अपने कार्य करने केकारण मनुष्य अपने मूल उद्देश्य सुख-शान्ति की दिशा में अग्रसर न होकर विपरीत दिशा में... आगे पढ़े

जहाँ शांति है वही सुख

Updated on 4 February, 2020, 6:00
यदि हमारे पास दुनिया का पूरा वैभव और सुख-साधन उपलब्ध है परंतु शांति नहीं है तो हम भी आम आदमी की तरह ही हैं। संसार में मनुष्यों द्वारा जितने भी कार्य अथवा उद्यम किए जा रहे हैं सबका एक ही उद्देश्य है 'शांति'। सबसे पहले तो हमें ये जान लेना... आगे पढ़े

सन्मार्ग की प्रवृत्ति

Updated on 3 February, 2020, 6:00
उत्तम कार्य की कार्य प्रणाली भी प्राय: उत्तम होती है। दूसरों की सेवा या सहायता करनी है, तो प्राय: मधुर भाषण, नम्रता, दान, उपहार आदि द्वारा उसे संतुष्ट किया जाता है। परन्तु कई बार इसके विपरीत क्रिया-प्रणाली ऐसी कठोर, तीक्ष्ण एवं कटु बनानी पड़ती है कि लोगों को भ्रम हो... आगे पढ़े

पशुवध निंदनीय-दंडनीय कर्म 

Updated on 2 February, 2020, 6:00
सतोगुण में किये गये पुण्यकर्मो का फल शुद्ध होता है, अतएव वे मुनिगण, जो समस्त मोह से मुक्त हैं, सुखी रहते हैं। लेकिन रजोगुण में किये गये कर्म दुख का कारण बनते है। भौतिक सुख के लिए जो भी कार्य किया जाता है, उसका विफल होना निश्चित है। उदाहरणार्थ, यदि... आगे पढ़े

एकता में भाषा भी अवरोध 

Updated on 1 February, 2020, 6:00
भाषा, जो दूसरों तक अपने विचारों को पहुंचाने का माध्यम है, उसे भी राष्ट्रीय एकता के सामने समस्या बनाकर खड़ा कर दिया जाता है. अपनी भाषा के प्रति आकषर्ण होना अस्वाभाविक नहीं है और मातृभाषा व्यक्ति के बौद्धिक विकास का सशक्त माध्यम बन सकती है, इसमें कोई संदेह नहीं. पर... आगे पढ़े

जीना और मरना

Updated on 31 January, 2020, 6:00
जिस भांति हम जीते हैं, उसे जीवन नाममात्र को ही कहा जा सकता है। हमे न जीवन का पता है; न जीवन के रहस्य का द्वार खुलता है। न जीवन के आनंद की वष्रा होती है; न हम यह जान पाते हैं कि हम क्यों जी रहे हैं, किसलिए जी... आगे पढ़े

विचार प्रांति की जरूरत

Updated on 28 January, 2020, 6:00
एक समय अवांछनीय व्यक्तियों या तत्वों को हटाने के लिए मुख्यत: शस्त्रबल से ही काम लिया जाता था। तब विचारशक्ति की व्यापकता का क्षेत्र खुला न था। बहुसंख्यक जनता को एक दिशा में सोचने, कुछ करने या संगठित करने के लिए उपयुक्त साधन न थे। इसलिए संसार में जब भी... आगे पढ़े

जीवन निर्भरता और आत्म -निर्भरता का संयोग है

Updated on 26 January, 2020, 6:00
जीवन में सम्पूर्ण आत्म निर्भरता जैसा कुछ नहीं है। इसे भूल जाओ। यदि आप सोचते हो कि मैं पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर हो जाऊं तो ऐसा नहीं होगा। 15, 16 या 17 साल की आयु तक आप आत्मनिर्भर नहीं थे। आप आश्रित ही पैदा हुए थे। आप अपने आप उठ... आगे पढ़े

जो हो रहा है उसके जिम्मेदार हम स्वंय हैं

Updated on 25 January, 2020, 6:00
हम मनुष्यों की एक सामान्य सी आदत है कि दु:ख की घड़ी में विचलित हो उठते हैं और परिस्थितियों का कसूरवार भगवान को मान लेते हैं। भगवान को कोसते रहते हैं कि 'हे भगवान हमने आपका क्या बिगाड़ा जो हमें यह दिन देखना पड़ रहा है।' गीता में श्री कृष्ण... आगे पढ़े

जैसा सोचेंगे वैसा ही फल मिलेगा

Updated on 24 January, 2020, 6:00
यदि आपका मन प्रसन्न नहीं है तो इसका जिम्मेदार कोई और नहीं है बल्कि आप स्वंय हैं। इसी प्रकार अगर आप सुखी है तो यह भी आपको अपने ही कारण प्राप्त हुआ है। ईश्वर का आपके सुख-दुŠ ख से कोई संबध नहीं है। ईश्वर तो मात्र कर्म का फल प्रदान... आगे पढ़े

 ईश्वरीय सिद्धांत 

Updated on 21 January, 2020, 0:00
तीन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्धांत व्यक्त होते हैं- यह जो संसार है परमात्मा से व्याप्त है, उसके अतिरिक्त सब मिथ्या है, माया है, भ्रम है, स्वप्न है। मनुष्य को उसकी इच्छानुसार सृष्टि संचालन के लिए कार्य करते रहना चाहिए। मनुष्य में जो श्रे…ता-शक्ति या सौन्दर्य है वह उसके दैवी गुणों के... आगे पढ़े

अपूर्णता से पूर्णता की ओर

Updated on 20 January, 2020, 6:00
मनुष्य का बाह्य जीवन वस्तुत: उसके आंतरिक स्वरूप का प्रतिबिम्ब मात्र होता है। जैसे ड्राइवर मोटर की दिशा में मनचाहा बदलाव कर सकता है। उसी प्रकार, जीवन के बाहरी ढर्रे में भारी और आश्चर्यकारी परिवर्तन हो सकता है। वाल्मीकि और अंगुलिमाल जैसे भयंकर डाकू क्षण भर में परिवर्तित होकर इतिहास... आगे पढ़े

 द्वंद्व के बीच शांति की खोज 

Updated on 19 January, 2020, 6:00
केवल ज्ञान की बातें करों। किसी व्यक्ति के बारे में दूसरे व्यक्ति से सुनी बातें मत दोहराओ। जब कोई व्यक्ति तुम्हें नकारात्मक बातें कहे, तो उसे वहीं रोक दो, उस पर वास भी मत करो। यदि कोई तुम पर कुछ आरोप लगाये, तो उस पर वास न करो। यह जान... आगे पढ़े

 जो हो रहा है उसके जिम्मेदार हम खुद हैं 

Updated on 18 January, 2020, 6:00
हम मनुष्यों की एक सामान्य सी आदत है कि दु?ख की घड़ी में विचलित हो उठते हैं और परिस्थितियों का कसूरवार भगवान को मान लेते हैं। भगवान को कोसते रहते हैं कि 'हे भगवान हमने आपका क्या बिगाड़ा जो हमें यह दिन देखना पड़ रहा है।' गीता में श्री कृष्ण... आगे पढ़े

मूवी रिव्यू